शुक्रवार, 18 जून 2010

आज बीजेपी ने गैस त्रासदी में कांग्रेस को घेरने के लिए भोपाल के पोलिटेक्निक चौराहे पर धरना दिया। डर था की कहीं धरना फ्लॉप ना हो इसलिए नए प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने पूरे प्रदेश के लोगों को इसमें शामिल कर लिया अब इनको कौन बतलाये की ये सब तो रूटीन है और नेता लोग भी यही कर रहे हैं। बीजेपी की असल में दिक्कत ये है की उसको लगता है की गैस का मामला जितनी तेजी से उभरेगा उतनी तेजी से शादी का काम बता कर झंझट बनता जा रहा है.

बुधवार, 16 जून 2010

गैस फिर उड़ रही है.

भोपाल की गैस त्रासदी पर अभी तो बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है लेकिन मेरा मानना है की अभी तो धूल उड़ रही है। असली तस्वीर कुछ दिन में साफ़ होगी तब ही कुछ कहना सही होगा। २५ - २६ साल से बहुत लोग कुछ कुछ कह और कर रहे हैं। जिन लोगों ने उस समय चुप्पी मारी थी वो भी अब बोल रहे हैं। बीजेपी बहुत हल्ला कर रही है, उसके नेता कांग्रेस को घेर रहे हैं जैसे बड़ा मुद्दा हाथ लग गया हो। कांग्रेस अभी चुप है और एक तरह से बचाव की मुद्रा है। लेकिन गैस पीड़ित अभी भी वहीँ खड़ा है जहाँ २५ साल पहले था। एंडरसन फरार है तो है ही। वो आएगा या नहीं ये भी नहीं पता। मीडिया के लिए तो उत्सव का माहौल है। जो हमेशा होता है। बहुत सारे सवाल हैं जिनका उत्तर बहुत सारे लोगों को देना है। नेता पत्रकार एन जी ओ अफसर वकील सब लगे हैं और अपना अपना राग अलाप रहे हैं। इसलिए अभी धूल छटने का इन्तजार करना चाहिए.

सोमवार, 7 जून 2010

आज का दिन (7 जून २०१०) बड़ा ही निराश करने वाला रहा इस दिन भोपाल के मुख्या न्यायिक दंडाधिकारी एम् पी तिवारी ने सदी के सबसे बड़े औद्योगिक हादसे पर फैसला सुनाया. फैसला इस बात पर रहा की २ और ३ दिसम्बर १९८४ की दरमियानी रात को जो मौतें हुई थी उसके दोषी वारेन एंडरसन, केशव महिंद्रा, विजय गोयल, किशोर कामदार, के पी शेट्टी, जे पी मुकुंद एस पी चौधरी, एस आई कुरैशी, आर पी रायचौधरी के खिलाफ ये मुकदमा था इसमें इन सभी को धारा३३६,३३७,३३८,और ३०४(अ) का दोषी पाया गया और जब सजा सुनाई गई तो अचरज था। १५२७४ मौत के जिम्मेवारों को केवल २ साल की सजा सुना दी गई फैसला सुनते ही गैस पीड़ित आग बबूला हो गए और वो महिलाएं जो २५ साल से लगातार लड़ रही थीं उनका गुस्सा फूट पड़ा इस फैसले को इन्साफ नहीं मानने वालों की तादाद बड़ी थी, लेकिन फैसला था सो सुनाया जा चुका था ये वो लड़ाई है जो इतनी जल्दी ना अदालत का पीछा छोड़ेगी और ना सरकार का जो इसके भुगत भोगी हैं यदि उनकी सुनी जाये तो २ और ३ दिसम्बर की दरमियानी रात का वो मंजर भोपाल के इतिहास की वो तारिख है जब एक तरफ लाशों का ढेर था तो दूसरी तरफ वारेन को बचाती मध्य प्रदेश की सरकार श्मशान और कब्रिस्तान में जगह कम पड़ने लगी औरपोस्टमार्टम के जानकार कहे जाने वाले डॉ सत्पथी ने भी कमाल कर दिया था तीन दिन में ३ हजार पोस्टमार्टम करके वो डॉ डेथ के नाम से जाने जाने लगे थे। लेकिन फैसला इतना निराशाजनक की किसी को नहीं भाया आज भी लोग वारेन को नहीं भूल पाए हैं इस मामले में देश की सबसे बड़ी एजेंसी सी बी आई की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं। तमाम बातों के बावजूद जो भी हुआ वो दुखी कर गया

गुरुवार, 3 जून 2010

दोस्तों दुनिया को जोड़ो और दुनिया से जुडो
अब मैं भी ब्लॉग पर आ गया हूँ बाज़ार में बैठे सारे लोग को नमस्कार